राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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 (कथा-कहानी) 
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गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई - दो बक्स, डोलची, बाल्टी। 'यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ  लज्जा से बोला, 'घरवाली ने साथ में कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था। 

'कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।' गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधता  हुआ बोला। 


'कभी कुछ ज़रूरत हो तो लिखना गनेशी, इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।' 


गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखे पोछी, 'अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा।  आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।' 

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