साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

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ग़ज़लें

ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्‍सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्‍सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्‍वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्‍यथा गैर मुरद्दफ़।

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लोग क्या से क्या न जाने हो गए | ग़ज़ल - डॉ. शम्भुनाथ तिवारी

लोग क्या से क्या न जाने हो गए
आजकल अपने बेगाने हो गए

 
ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है | ग़ज़ल - डा अदिति कैलाश

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

मुश्किल है अब तो जीना एक पल भी तेरे बिन
ये जान कर भी तू मुझसे यूँ अनजान क्यूँ है

कमी नहीं है प्यार की इस जहाँ में देख लो
पर हर शख्स यहाँ इतना परेशान क्यूँ है

दोस्ती से हसीं कुछ नहीं है इस जहाँ में यारों
हर दिल में यहाँ दुश्मनी का सामान क्यूँ है

नहीं सोचा था रह जाउंगी मै भी कभी यूँ तन्हा
सपनों के रास्तें में ये बड़ा शमशान क्यूँ है

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

 
हौसले मिटते नहीं  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी

हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद
मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद

 

 

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