साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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पथ से भटक गया था राम | भजन - रोहित कुमार 'हैप्पी'

पथ से भटक गया था राम
नादानी में हुआ ये काम
 
छोड़ गए सब संगी साथी
संकट में प्रभु तुम लो थाम
 
तू सबके दुःख हरने वाला
बिगड़े संवारे सबके काम
 
तेरा हर पल ध्यान धरुं मैं
ऐसा पिला दे प्रेम का जाम

 
हे दयालु ईश मेरे दुख मेरे हर लीजिए | भजन - रोहित कुमार 'हैप्पी'

हे दयालु ईश मेरे दुख मेरे हर लीजिए
दूं परीक्षा लंबी कितनी, कुछ तो करुणा कीजिए।
हे दयालु ईश मेरे दुख मेरे हर लीजिए ।।

 
अँधेरे में  - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh

जिंदगी के...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज पैरों की देती है सुनाई
बार-बार... बार-बार,
वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता,
किंतु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है - वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह -
खुद-ब-खुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !
कौन मनु ?

 
राम का नाम बड़ा सुखदाई | भजन - रोहित कुमार 'हैप्पी'

राम का नाम बड़ा सुखदाई
तेरे प्रेम में हुआ शौदाई।

 
जग में अजब है तेरा नाम | भजन - रोहित कुमार 'हैप्पी'

जग में अजब है तेरा नाम
बिगड़े संवारे तू सब काम।
जग में अजब है तेरा नाम॥

 
लोग क्या से क्या न जाने हो गए | ग़ज़ल - डॉ. शम्भुनाथ तिवारी

लोग क्या से क्या न जाने हो गए
आजकल अपने बेगाने हो गए

 
ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है | ग़ज़ल - डा अदिति कैलाश

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

मुश्किल है अब तो जीना एक पल भी तेरे बिन
ये जान कर भी तू मुझसे यूँ अनजान क्यूँ है

कमी नहीं है प्यार की इस जहाँ में देख लो
पर हर शख्स यहाँ इतना परेशान क्यूँ है

दोस्ती से हसीं कुछ नहीं है इस जहाँ में यारों
हर दिल में यहाँ दुश्मनी का सामान क्यूँ है

नहीं सोचा था रह जाउंगी मै भी कभी यूँ तन्हा
सपनों के रास्तें में ये बड़ा शमशान क्यूँ है

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

 
आँसू के कन - जयशंकर प्रसाद | Jaishankar Prasad

वसुधा के अंचल पर

   यह क्या कन-कन सा गया बिखर !
जल शिशु की चंचल क्रीड़ा-सा
जैसे सरसिज दल पर ।

लालसा निराशा में दलमल
वेदना और सुख में विह्वल
यह क्या है रे मानव जीवन!
             कितना था रहा निखर।

मिलने चलते अब दो कन
आकर्षण -मय चुम्बन बन
दल की नस-नस में बह जाती
               लघु-मघु धारा सुन्दर।

हिलता-डुलता चंचल दल,
ये सब कितने हैं रहे मचल
कन-कन अनन्त अम्बुधि बनते
          कब रूकती लीला निष्ठुर ।

तब क्यों रे, फिर यह सब क्यों
यह रोष भरी लीला क्यों ?
गिरने दे नयनों से उज्ज्वल
             आँसू के कन मनहर
             वसुधा के अंचल पर ।

 
हौसले मिटते नहीं  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी

हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद
मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद

 
कही अल्लाह कही राम लिख देंगे - यतीन्द्र श्रीवास्तव

कही अल्लाह कही राम लिख देंगे !
इंक़लाब का तूफ़ान लिख देंगे !!
जितना मर्ज़ी चाहे मिटा लो दुनिया वालो !
हम ज़र्रे ज़र्रे में हिंदुस्तान लिख देंगे !!

ज़मीने बदल गई , आसमान बदल गए !
इक चादर में सोने वालो के मकाँ बदल गए !!
इस बदलाव के नाम एक पैग़ाम लिख देंगे !
हम हर उगते हुए माथे पे एक हिंदुस्तान लिख देंगे !!

सच कि तलाश में आईने निकल गए !
अँधेरा इतना गर्म था कि उजाले पिघल गए !!
हम ऐसे मौसम के नाम फ़रमान लिख देंगे !
मंदिरो कि हवाओं पे अ- सलाम लिख देंगे !!

न रहे राज़ कोई न राज़दारी रहे !
दुनिया में कुछ रहे तो ईमान और वफादारी रहे !!
हर बिगड़े हुए ईमान को बे-ईमान लिख देंगे !
हम हर जुबां पे सर ज़मीने-ए-हिंदुस्तान लिख देंगे !!

 
बाबा | हास्य कविता - रोहित कुमार 'हैप्पी'

दूर बस्ती से बाहर
बैठा था एक फ़क़ीर
पेट से भूखा था
तन कांटे सा सूखा था।

 
संवाद | कविता - रोहित कुमार 'हैप्पी'

"अब तो भाजपा की सरकार आ गई ।"
मैंने उस गुमसुम रिक्शा वाले से संवाद स्थापित किया ।

 

 

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