| हास्य काव्य |
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| भारतीय काव्य में रसों की संख्या नौ ही मानी गई है जिनमें से हास्य रस (Hasya Ras) प्रमुख रस है जैसे जिह्वा के आस्वाद के छह रस प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार हृदय के आस्वाद के नौ रस प्रसिद्ध हैं - श्रृंगार रस (रति भाव), हास्य रस (हास), करुण रस (शोक), रौद्र रस (क्रोध), वीर रस (उत्साह), भयानक रस (भय), वीभत्स रस (घृणा, जुगुप्सा), अद्भुत रस (आश्चर्य), शांत रस (निर्वेद)। |
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| Literature Under This Category |
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काका हाथरसी का हास्य काव्य
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार
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हास्य दोहे | काका हाथरसी
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज, ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज
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सीखा पशुओं से | व्यंग्य कविता
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
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| कुत्ते से सीखी चापलूसी मलाई चट करना बता गई पूसी बकरे से अहं ब्रह्मास्मि-मैं-मैं कहां तक जानवरों को धन्यवाद दें ! बैलों से सीखा खटना, दुम्बे से चोट मारने के लिए पीछे हटना, भेड़िए से अपने लिए खुद कानून बनाना, भेंड़ों से आंख मूंदकर पीछे-पीछे आना, लोमड़ी ने सिखलाई चालाकी बताओ, अब और क्या रह गया बाकी ?
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टूट गयी खटिया
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| हे वोटर महाराज, आप नहीं आये आखिर अपनी हरकत से बाज़ नोट हमारे दाब लिये और वोट नहीं डाला दिखा नर्मदा घाट सौंप दी हाथों में माला डूब गये आंसू में मेरे छप्पर और छानी ऊपर से तुम दिखलाते हो चुल्लू भर पानी मिले ना लड्डू लोकतंत्र के दाव गया खाली सूख गई क़िस्मत की बगिया रूठ गया माली बाप-कमाई साफ़ हो गई हाफ़ हुई काया लोकतंत्र के स्वप्न महल का खिसक गया पाया चाट गई सब चना चबैना ये चुनाव चकिया गद्दी छीनी प्रतिद्वन्दी ने चमचों ने तकिया चाय पानी और बोतलवाले करते हैं फेरे बीस हज़ार, बीस खातों में चढे नाम मेरे झंडा गया भाड़ में मेरा, हाय पड़ा महंगा बच्चो ने चड्डी सिलवा ली, बीवी ने लहंगा टूट गई रिश्वत की डोरी, डूब गई लुटिया बिछने से पहले ही मेरी टूट गई खटिया
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कवि फ़रोश | पैरोडी
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ मैं तरह-तरह के कवि बेचता हूँ मैं किसिम-किसिम के कवि बेचता हूँ।
जी, वेट देखिए, रेट बताऊं मैं पैदा होने की डेट बताऊं मैं जी, नाम बुरा, उपनाम बताऊं मैं जी, चाहे तो बदनाम बताऊं मैं जी, इसको पाया मैंने दिल्ली में जी, उसको पकड़ा त्रिचनापल्ली में जी, कलकत्ते में इसको घेरा है जी, वह बंबइया अभी बछेरा है जी, इसे फंसाया मैंने पूने में जी, तन्हाई में, उसको सूने में ये बिना कहे कविता सुनवाता है जी, उसे सुनो, तो चाय पिलाता है जो, लोग रह गए धँधे में कच्चे जी, उन लोगों ने बेच दिए बच्चे जी, हुए बिचारे कुछ ऐसे भयभीत जी, बेच दिए घबरा के अपने गीत।
- मैं सोच समझ कर कवि बेचता हूँ
- जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ।
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बाजार का ये हाल है | हास्य व्यंग्य संग्रह
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| बाज़ार का ये हाल है - हास्य-व्यंग्य-संग्रह
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सौदागर ईमान के
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| आँख बंद कर सोये चद्दर तान के, हम ही हैं वो सेवक हिन्दुस्तान के ।
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आराम करो | हास्य कविता
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
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| एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो? इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो। क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो। संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।" हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो। इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो। आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है। आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है। आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है। आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है। इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो। ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो। यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो। अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो। करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में। जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में। तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ, है मज़ा मूर्ख कहलाने में। जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में। मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ। जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ। दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ। जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ। मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं, वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं। अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है। वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है। जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है, तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है। मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है। भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है। मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ। मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ। मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं। छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं। मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो। यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो। - गोपालप्रसाद व्यास
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हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
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| हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम ! शब्दकोश में प्रिये, और भी बहुत गालियाँ मिल जाएँगी जो चाहे सो कहो, मगर तुम मरी उमर की डोर गहो तुम ! हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
क्या कहती हो-दांत झड़ रहे ? अच्छा है, वेदान्त आएगा। दाँत बनाने वालो का भी अरी भला कुछ हो जाएगा ।
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नहीं है आदमी की अब | हज़ल
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में
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बाबा | हास्य कविता
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| दूर बस्ती से बाहर बैठा था एक फ़क़ीर पेट से भूखा था तन कांटे सा सूखा था।
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भिखारी| हास्य कविता
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| एक भिखारी दुखियारा भूखा, प्यासा भीख मांगता फिरता मारा-मारा! 'अबे काम क्यों नहीं करता?' 'हट......हट!!' कोई चिल्लाता, कोई मन भर की सीख दे जाता। पर.....पर.... भिखारी भीख कहीं ना पाता! भिखारी मंदिर के बाहर गया भक्तों को 'राम-राम' बुलाया किसी ने एक पैसा ना थमाया भगवन भी काम ना आया! मस्जिद पहुँचा आने-जाने वालों को दुआ-सलाम बजाया किसी ने कौडी ना दी मुसीबत में अल्लाह भी पार ना लाया! भिखारी बदहवास कोई ना बची आस जान लेवा हो गई भूख-प्यास। जाते-जाते ये भी आजमा लूँ गुरूद्वारे भी शीश नवा लूं! 'सरदार जी, भूखा-प्यासा हूं।।। 'ओए मेरा कसूर अ?' भिखारी को लगा किस्मत बडी दूर है। आगे बढा़.... तभी एक देसी ठेके से बाहर निकलता शराबी नजर आया भिखारी ने फिर अपना अलाप दोहराया।। 'बाबू भूखे को खाना मिल जाए तेरी जोडी बनी रहे, तू ऊँचा रूतबा पाए।'
'अरे भाई क्या चाहिए' 'बाबू दो रूपया --- भूखे पेट का सवाल है!' शराबी जेब में हाथ डाल बुदबुदाया।।। 'अरे, तू तो बडा बेहाल है!' 'बाबू दो रूपये......' 'अरे दो क्या सौ ले।' 'बाबू बस खाने को......दो ही.....दो ही काफ़ी है।' 'अरे ले पकड सौ ले... पेट भर के खाले...... बच जाए तो ठररे की चुस्की लगा ले।।।' हाथ पे सौ का नोट धर शराबी आगे बढ ग़या। भिखारी को मानो अल्लाह मिल गया। 'तेरी जोडी बनी रहे, तू ऊँचा रूतबा पाए!' भिखारी धीरे से घर की राह पकडता है। रस्ते में फिर मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारा पड़ता है। भिखारी धीरे से बुदबुदाता है....... 'वाह रे भगवन्....... तू भी खूब लीला रचाता है मांगने वालों से बचता फिरता, इधर-उधर छिप जाता है रहता कहीं हैं बताता कहीं है आज अगर ठेके न जाता खुदाया, मैं तो भूखों ही मर जाता! इधर-उधर भटकता रहता तेरा सही पता भी न पाता तेरा सही पता भी न पाता! तेरा सही पता भी न पाता!! - रोहित कुमार 'हैप्पी'
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