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| Literature Under This Category | ||||
| मैंने लिखा कुछ भी नहीं | ग़ज़ल - डॉ सुधेश | ||||
| मैंने लिखा कुछ भी नहीं |
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| ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है | ग़ज़ल - वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi | ||||
| ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है |
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| वसीम बरेलवी की ग़ज़ल - वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi | ||||
| मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा |
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| भूल कर भी न बुरा करना | ग़ज़ल - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा' | ||||
| भूल कर भी न बुरा करना |
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| झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं | ग़ज़ल - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar | ||||
| झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं |
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| तमाम घर को .... | ग़ज़ल - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek | ||||
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तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें भर लीं, वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों- न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा, हमेशा बात वो करता था घर बनाने की मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद, -ज्ञानप्रकाश विवेक |
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| हो गई है पीर पर्वत-सी | दुष्यंत कुमार - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar | ||||
| हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए |
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| राजगोपाल सिंह की ग़ज़लें - राजगोपाल सिंह | ||||
| राजगोपाल सिंह की ग़ज़लें भी उनके गीतों व दोहों की तरह सराही गई हैं। यहाँ उनकी कुछ ग़ज़लें संकलित की जा रही हैं। |
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| इन चिराग़ों के | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| इन चिराग़ों के उजालों पे न जाना, पीपल |
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| अदम गोंडवी की ग़ज़लें - अदम गोंडवी | ||||
| अदम गोंडवी को हिंदी ग़ज़ल में दुष्यन्त कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला शायर माना जाता है। राजनीति, लोकतंत्र और व्यवस्था पर करारा प्रहार करती अदम गोंडवी की ग़ज़लें जनमानस की आवाज हैं। यहाँ उन्हीं की कुछ गज़लों का संकलन किया जा रहा है। |
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| आँख पर पट्टी रहे | ग़ज़ल - अदम गोंडवी | ||||
| आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे |
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| उदयभानु हंस की ग़ज़लें - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans | ||||
| उदयभानु हंस का ग़ज़ल संकलन |
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| हमने अपने हाथों में - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans | ||||
| हमने अपने हाथों में जब धनुष सँभाला है, |
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| कुंअर बेचैन ग़ज़ल संग्रह - कुँअर बेचैन | ||||
| कुंअर बेचैन ग़ज़ल संग्रह - यहाँ डॉ० कुँअर बेचैन की बेहतरीन ग़ज़लियात संकलित की गई हैं। विश्वास है आपको यह ग़ज़ल-संग्रह पठनीय लगेगा। |
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| अपना जीवन.... | ग़ज़ल - कुँअर बेचैन | ||||
| अपना जीवन निहाल कर लेते |
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| निराला की ग़ज़लें - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala' | ||||
| निराला का ग़ज़ल संग्रह - इन पृष्ठों में निराला की ग़ज़लें संकलित की जा रही हैं। निराला ने विभिन्न विधाओं में साहित्य-सृजन किया है। यहाँ उनके ग़ज़ल सृजन को पाठकों के समक्ष लाते हुए हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है। |
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| भगत सिंह को पसंद थी ये ग़ज़ल - भारत-दर्शन संकलन | Collections | ||||
| उन्हें ये फिक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है |
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| सामने गुलशन नज़र आया | ग़ज़ल - डॉ सुधेश | ||||
| सामने गुलशन नज़र आया |
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| कबीर की हिंदी ग़ज़ल - कबीरदास | Kabirdas | ||||
| क्या कबीर हिंदी के पहले ग़ज़लकार थे? यदि कबीर की निम्न रचना को देखें तो कबीर ने निसंदेह ग़ज़ल कहीं है: |
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| ताज़े-ताज़े ख़्वाब | ग़ज़ल - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar | ||||
| ताज़े-ताज़े ख़्वाब सजाये रखता है |
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| किसी के दुख में .... | ग़ज़ल - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek | ||||
| किसी के दुख में रो उट्ठूं कुछ ऐसी तर्जुमानी दे -ज्ञानप्रकाश विवेक |
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| इस नदी की धार में | दुष्यंत कुमार - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar | ||||
| इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है |
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| मैं रहूँ या न रहूँ | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा पता रह जाएगा |
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| हिन्दू या मुस्लिम के | ग़ज़ल - अदम गोंडवी | ||||
| हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए |
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| सीता का हरण होगा - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans | ||||
| कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा? |
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| कोई फिर कैसे.... | ग़ज़ल - कुँअर बेचैन | ||||
| कोई फिर कैसे किसी शख़्स की पहचान करे |
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| मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar | ||||
| मैं अपनी ज़िन्दगी से रूबरू यूँ पेश आता हूँ |
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| मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar | ||||
| मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ |
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| अजनबी नज़रों से | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| अजनबी नज़रों से अपने आप को देखा न कर |
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| काजू भुने पलेट में | ग़ज़ल - अदम गोंडवी | ||||
| काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में |
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| सपने अगर नहीं होते | ग़ज़ल - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans | ||||
| मन में सपने अगर नहीं होते, |
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| भरोसा इस क़दर मैंने | ग़ज़ल - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar | ||||
| भरोसा इस क़दर मैंने तुम्हारे प्यार पर रक्खा |
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| मौज-मस्ती के पल भी आएंगे | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| मौज-मस्ती के पल भी आएंगे |
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| घर में ठंडे चूल्हे पर | ग़ज़ल - अदम गोंडवी | ||||
| घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है |
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| जी रहे हैं लोग कैसे | ग़ज़ल - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans | ||||
| जी रहे हैं लोग कैसे आज के वातावरण में, बेशरम जब आँख हो तो सिर्फ घूंघट क्या करेगा ? |
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| पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar | ||||
| पुराने ख़्वाब के फिर से नये साँचे बदलती है |
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| जिस्म क्या है | ग़ज़ल - अदम गोंडवी | ||||
| जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये |
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| काग़ज़ी कुछ कश्तियाँ | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| काग़ज़ी कुछ कश्तियाँ नदियों में तैराते रहे |
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| आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख | ग़ज़ल - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar | ||||
| आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख |
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| जो डलहौज़ी न कर पाया | ग़ज़ल - अदम गोंडवी | ||||
| जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे |
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| बदलीं जो उनकी आँखें - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala' | ||||
| बदलीं जो उनकी आँखें, इरादा बदल गया । |
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| जितने पूजाघर हैं | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| जितने पूजाघर हैं सबको तोड़िये |
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| किनारा वह हमसे - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala' | ||||
| किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं। |
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| लूटकर ले जाएंगे | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| लूटकर ले जाएंगे सब देखते रह जाओगे |
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| बग़ैर बात कोई | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| बग़ैर बात कोई किसका दुख बँटाता है |
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| आजकल हम लोग ... | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह | ||||
| आजकल हम लोग बच्चों की तरह लड़ने लगे |
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| भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ग़ज़ल - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra | ||||
| गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में |
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| भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ग़ज़ल - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra | ||||
| आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया । |
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| एक ऐसी भी घड़ी आती है / ग़ज़ल - रोहित कुमार 'हैप्पी' | ||||
| एक ऐसी भी घड़ी आती है |
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| उसे यह फ़िक्र है हरदम - भगत सिंह | ||||
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| कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar | ||||
| कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें |
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| दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar | ||||
| दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें |
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| जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है | ग़ज़ल - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा' | ||||
| जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है |
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| प्रतिपल घूंट लहू के पीना | ग़ज़ल - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा' | ||||
| प्रतिपल घूँट लहू के पीना, |
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| बात हम मस्ती में ऐसी कह गए | ग़ज़ल - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा' | ||||
| बात हम मस्ती में ऐसी कह गए, |
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| बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से - विजय कुमार सिंघल | ||||
| बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से |
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| जंगल-जंगल ढूँढ रहा है | ग़ज़ल - विजय कुमार सिंघल | ||||
| जंगल-जंगल ढूँढ रहा है मृग अपनी कस्तूरी को |
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| डॉ सुधेश की ग़ज़लें - डॉ सुधेश | ||||
| डॉ सुधेश दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी के प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त हैं। आप हिंदी में विभिन्न विधाओ में सृजन करते हैं। यहाँ आपकी ग़ज़लेंसंकलित की गई हैं। |
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| लोग क्या से क्या न जाने हो गए | ग़ज़ल - डॉ शम्भुनाथ तिवारी | ||||
| लोग क्या से क्या न जाने हो गए |
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| बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या | ग़ज़ल - डॉ शम्भुनाथ तिवारी | ||||
| बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या |
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| नहीं कुछ भी बताना चाहता है | ग़ज़ल - डॉ शम्भुनाथ तिवारी | ||||
| नहीं कुछ भी बताना चाहता है |
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| हौसले मिटते नहीं - डॉ शम्भुनाथ तिवारी | ||||
| हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद |
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| कौन यहाँ खुशहाल बिरादर - डॉ शम्भुनाथ तिवारी | ||||
| कौन यहाँ खुशहाल बिरादर |
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| उलझे धागों को सुलझाना - डॉ शम्भुनाथ तिवारी | ||||
| उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है |
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| ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़लें - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek | ||||
| प्रस्तुत हैं ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़लें ! |
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